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mahabharat 12.325.16: पिता की आज्ञा मानकर उन्होंने पूरी यात्रा पैदल ही तय की, और उसी विषय पर मनन करते रहे जिसे जानना आवश्यक था। जैसे आकाश में पक्षी चलते हैं, वैसे ही वे पृथ्वी पर भी चलते रहे।   |   mahabharat अध्याय 12.325: पिताकी आज्ञासे शुकदेवजीका मिथिलामें जाना और वहाँ उनका द्वारपाल, मन्त्री और युवती स्त्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 325: पिताकी आज्ञासे शुकदेवजीका मिथिलामें जाना और वहाँ उनका द्वारपाल, मन्त्री और युवती स्त्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.325.16 
पितुर्वचनमाज्ञाय तमेवार्थं विचिन्तयन्।
अध्वानं सोऽतिचक्राम खेचर: खे चरन्निव॥ १६॥
 
 
अनुवाद
पिता की आज्ञा मानकर उन्होंने पूरी यात्रा पैदल ही तय की, और उसी विषय पर मनन करते रहे जिसे जानना आवश्यक था। जैसे आकाश में पक्षी चलते हैं, वैसे ही वे पृथ्वी पर भी चलते रहे।
 
Obeying his father's command, he traversed the entire journey on foot, meditating on the same subject that needed to be known. Just like a bird in the sky, he also travelled on the earth in the same manner.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)