श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 325: पिताकी आज्ञासे शुकदेवजीका मिथिलामें जाना और वहाँ उनका द्वारपाल, मन्त्री और युवती स्त्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना  » 
 
 
अध्याय 325: पिताकी आज्ञासे शुकदेवजीका मिथिलामें जाना और वहाँ उनका द्वारपाल, मन्त्री और युवती स्त्रियोंके द्वारा सत्कृत होनेके उपरान्त ध्यानमें स्थित हो जाना
 
श्लोक 1:  भीष्म कहते हैं - युधिष्ठिर! शुकदेवजी मोक्ष का विचार करते हुए अपने पिता और गुरु व्यासजी के पास गए और विनयपूर्वक तथा कल्याण की इच्छा से उनके चरणों में प्रणाम करके उनसे इस प्रकार बोले -॥1॥
 
श्लोक 2:  प्रभु! आप मोक्षमार्ग में कुशल हैं, अतः मुझे ऐसा उपदेश दीजिए, जिससे मेरे मन को परम शांति मिले।'
 
श्लोक 3:  अपने पुत्र की बातें सुनकर महर्षि व्यास ने कहा, 'पुत्र! तुम्हें मोक्ष तथा अन्य अनेक धर्मों का अध्ययन करना चाहिए।'
 
श्लोक 4:  भरत! पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ शुक ने अपने पिता की आज्ञा से सम्पूर्ण योगशास्त्र और सम्पूर्ण सांख्य का अध्ययन किया ॥4॥
 
श्लोक 5-6:  जब व्यासजी ने यह जान लिया कि उनका पुत्र दिव्य तेज से युक्त हो गया है और मोक्ष धर्म में पारंगत हो गया है तथा समस्त शास्त्रों में ब्रह्म के समान गति को प्राप्त हो गया है, तब उन्होंने कहा, "पुत्र! अब तुम मिथिला के राजा जनक के पास जाओ। मिथिला के राजा तुम्हें सम्पूर्ण मोक्ष शास्त्र का सार बताएँगे।" ॥5-6॥
 
श्लोक 7:  हे मनुष्यों के स्वामी! पिता की आज्ञा पाकर शुकदेवजी धर्मनिष्ठा और मोक्षरूपी परम आश्रय की जिज्ञासा करने के लिए मिथिला की ओर चल पड़े।
 
श्लोक 8:  जाते समय व्यास जी ने बिना किसी आश्चर्य के पुनः कहा - 'बेटा! तुम भी उसी मार्ग से यात्रा करो जिस मार्ग से सामान्य लोग जाते हैं। अपनी योगशक्ति का सहारा लेकर कभी भी वायु मार्ग से यात्रा मत करना।'
 
श्लोक 9:  सरलतापूर्वक यात्रा करनी चाहिए। मार्ग में सुख-सुविधा की खोज नहीं करनी चाहिए। विशिष्ट व्यक्तियों या स्थानों का अनुसंधान नहीं करना चाहिए; क्योंकि इससे उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है॥9॥
 
श्लोक 10:  राजा जनक मेरे आश्रयदाता हैं, अतः तुम उनके प्रति अहंकार न करो और सब प्रकार से उनकी आज्ञा में रहो। वे तुम्हारे सब संदेह दूर कर देंगे॥ 10॥
 
श्लोक 11:  मेरे आश्रयदाता राजा जनक धर्म में पारंगत हैं और मोक्ष-शास्त्रों के ज्ञाता हैं। वे तुम्हें जो भी आदेश दें, उसका तुम निःसंदेह पालन करो।॥11॥
 
श्लोक 12:  पिता की यह बात सुनकर पुण्यात्मा शुकदेव मुनि मिथिला की ओर चल पड़े। यद्यपि वे आकाशमार्ग से सम्पूर्ण पृथ्वी को पार करने में समर्थ थे, फिर भी वे पैदल ही चल पड़े॥12॥
 
श्लोक 13-14:  मार्ग में उन्हें अनेक पर्वत, नदियाँ, तीर्थ और सरोवर पार करने पड़े। उन्हें सर्पों और वन्य पशुओं से भरे हुए अनेक वनों से होकर गुजरना पड़ा। उन सबको पार करके वे क्रमशः मेरु (इलावृत) वर्ष, हरिवर्ष और हैमवत (किम्पुरुष) वर्ष पार करके भारतवर्ष पहुँचे॥13-14॥
 
श्लोक 15:  चीन आदि अनेक देशों तथा हूण जाति से सेवित देशों का भ्रमण करके महामुनि शुकदेव इस आर्यावर्त देश में आये॥ 15॥
 
श्लोक 16:  पिता की आज्ञा मानकर उन्होंने पूरी यात्रा पैदल ही तय की, और उसी विषय पर मनन करते रहे जिसे जानना आवश्यक था। जैसे आकाश में पक्षी चलते हैं, वैसे ही वे पृथ्वी पर भी चलते रहे।
 
श्लोक 17:  मार्ग में सुन्दर नगर, कस्बे और समृद्ध नगर दिखाई दिए। नाना प्रकार के विचित्र रत्न दिखाई दिए; परन्तु शुकदेव जी उन्हें देखते हुए भी नहीं देख पाए।
 
श्लोक 18:  यात्री शुकदेव ने अनेक सुन्दर उद्यान, भवन और मन्दिर देखे, परन्तु उनकी उपेक्षा की। उनके सामने अनेक पवित्र रत्न रखे गए, परन्तु वे उन सबको छोड़कर आगे बढ़ गए॥18॥
 
श्लोक 19:  इस प्रकार यात्रा करते हुए वे थोड़े ही समय में विदेह क्षेत्र में पहुँच गए, जिसका पालन-पोषण महान धर्मराज जनक ने किया था॥19॥
 
श्लोक 20:  वहाँ उन्होंने कई गाँव देखे जहाँ अनाज, पानी और तरह-तरह की खाने-पीने की चीज़ें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थीं। उन्होंने छोटे-छोटे समूह और गौशालाएँ भी देखीं जो बहुत समृद्ध थीं और जिनमें बड़ी संख्या में गौ-समुदाय भरे हुए थे।
 
श्लोक 21:  सम्पूर्ण विदेह प्रांत में अघनै चावल की खेती सर्वत्र फल-फूल रही थी। वहाँ के निवासी धन-धान्य से समृद्ध थे। उस देश में सर्वत्र हंस और सारस रहते थे। कमलों से सुशोभित सैकड़ों सुंदर सरोवर विदेह राज्य की शोभा बढ़ा रहे थे।
 
श्लोक 22:  इस प्रकार, समृद्ध लोगों से सेवित, विदेह देश को पार करते हुए, वह मिथिला के समृद्ध और सुंदर उद्यान में पहुँचे।
 
श्लोक 23:  वह स्थान हाथी, घोड़े और रथों से भरा हुआ था। असंख्य नर-नारी वहाँ आते-जाते दिखाई दे रहे थे। शुकदेवजी, जो अपनी मर्यादा से कभी विचलित नहीं होते थे, वहाँ से ऐसे आगे बढ़ गए मानो उन्हें कुछ देखकर भी कुछ दिखाई न दे॥ 23॥
 
श्लोक 24:  मन में जिज्ञासा का भार लेकर तथा जानने योग्य विषय का चिन्तन करते हुए आत्मसंतुष्ट एवं प्रसन्नचित्त शुकदेव ने मिथिला में प्रवेश किया।
 
श्लोक 25:  नगर के द्वार पर पहुँचकर वे बिना किसी संकोच के भीतर जाने लगे, परन्तु वहाँ के द्वारपालों ने उन्हें कठोर फटकार लगाई और भीतर जाने से रोक दिया॥ 25॥
 
श्लोक 26:  शुकदेवजी वहीं खड़े रहे; परंतु उनके हृदय में न तो खेद था, न क्रोध। यात्रा की थकान और सूर्य का ताप उन्हें पीड़ा नहीं दे रहा था। भूख-प्यास भी उन्हें पीड़ा नहीं दे रही थी॥ 26॥
 
श्लोक 27:  उन्हें न तो गर्मी से परेशानी हुई, न ही शर्मिंदगी महसूस हुई और वे कभी भी धूप से दूर छाया की तलाश में नहीं गए। उस समय एक द्वारपाल को उसके व्यवहार पर बहुत दुख हुआ।
 
श्लोक 28-29h:  शुकदेवजी को मध्यान्ह के सूर्य के समान शान्त खड़े देखकर उन्होंने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और शास्त्रानुसार विधिपूर्वक उनका पूजन करके उन्हें राजभवन की दूसरी मंजिल पर ले गए।
 
श्लोक 29-30h:  पिताश्री! वहाँ एक स्थान पर बैठकर परम तेजस्वी शुकदेवजी मोक्ष के विषय में विचार करने लगे। धूप हो या छाया, दोनों में उनकी दृष्टि एक-सी थी।
 
श्लोक 30-31h:  थोड़ी देर बाद राजमंत्री हाथ जोड़कर वहाँ आये और उन्हें अपने साथ महल की तीसरी मंजिल पर ले गए।
 
श्लोक 31-32:  भीतरी महल से लगा हुआ एक अत्यंत सुंदर और विशाल उद्यान था, जो चैत्ररथ वन के समान मनोहर प्रतीत होता था। वहाँ जलक्रीड़ा के लिए अलग-अलग अनेक सुंदर जलाशय बने हुए थे। वह सुंदर उद्यान पुष्पित वृक्षों से सुशोभित था। उस उत्कृष्ट उद्यान का नाम प्रमदावन था। मंत्री शुकदेवजी को उसके भीतर ले गए। 31-32।
 
श्लोक 33-36h:  उनके लिए सुन्दर आसन की व्यवस्था करके राजमंत्री पुनः वन से बाहर आये। मंत्री के जाते ही पचास प्रमुख गणिकाएँ दौड़ती हुई शुकदेवजी के पास आईं। उनका वेश-भूषा अत्यंत मनमोहक थी। वे सभी अत्यंत सुंदर और तरुण लग रही थीं। उनकी कटि सुंदर थी। उनके सुंदर शरीर पर महीन लाल साड़ियाँ शोभायमान थीं। तपाये हुए सोने के आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। वे बातचीत में कुशल थीं और नृत्य-गान की कला में अत्यंत निपुण थीं। उनका रूप अप्सराओं के समान था, वे मंद मुस्कान के साथ बातें करती थीं और दूसरों के मनोभावों को समझती थीं। वे मैथुन में कुशल थीं और सभी कलाओं में विशेष पारंगत थीं।
 
श्लोक 36-37h:  उन्होंने जल आदि अर्पण करके उत्तम प्रकार से शुकदेवजी का पूजन किया और यथासमय उन्हें पूर्ण तृप्ति प्रदान करते हुए स्वादिष्ट भोजन कराया ॥36 1/2॥
 
श्लोक 37-38h:  हे भरतपुत्र! जब वे भोजन कर चुके, तब गणिकाएँ उन्हें अपने साथ अन्तःपुर के सुन्दर वन में ले गईं और वहाँ की प्रत्येक वस्तु उन्हें दिखाने लगीं। 37 1/2
 
श्लोक 38-39h:  उस समय वे हँसती, गाती और नाना प्रकार के सुन्दर क्रीड़ाओं में लीन रहती थीं। मन के भावों को समझने वाली वे सुन्दर स्त्रियाँ उदार शुकदेवजी की हर प्रकार से सेवा करने लगीं।
 
श्लोक 39-40h:  परन्तु आर्णि संभव शुकदेव का हृदय पूर्णतः निर्मल था। उन्होंने अपनी इंद्रियों और क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली थी। वे न तो किसी बात पर प्रसन्न होते थे, न ही किसी पर क्रोध करते थे। उनके मन में किसी प्रकार का कोई संशय नहीं था और वे सदैव अपना कर्तव्य निभाते थे।
 
श्लोक 40-41h:  उन सुन्दर स्त्रियों ने शुकदेवजी को शयन के लिए देवताओं के बैठने के योग्य, रत्नजटित तथा बहुमूल्य बिछौने से युक्त दिव्य शय्या दी।
 
श्लोक 41-43h:  परन्तु शुकदेव ने पहले हाथ-पैर धोकर संध्यावंदन किया। तत्पश्चात वे पवित्र आसन पर बैठकर मोक्ष-तत्त्व का चिंतन करने लगे। रात्रि के प्रथम प्रहर में वे ध्यान में बैठे रहे। तत्पश्चात मध्य रात्रि (द्वितीय और तृतीय प्रहर) में महाबली शुकदेव ने उचित निद्रा ग्रहण की। 41-42 1/2।
 
श्लोक 43-44:  तदनन्तर जब रात्रि के दो पहर शेष रह गए, तब ब्रह्मवेला में वे पुनः उठे और स्नान-शौच आदि से निवृत्त होकर बुद्धिमान् शुकदेव पुनः भगवान् के ध्यान में मग्न हो गए। उस समय भी वे सुन्दर स्त्रियाँ उन्हें घेरे बैठी थीं। 43-44॥
 
श्लोक 45:  हे भरतपुत्र! इस प्रकार से, कभी भी अपनी मर्यादा से विचलित न होने वाले व्यासनन्दन शुक ने शेष दिन और पूरी रात उस राजमहल में बितायी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)