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mahabharat 12.324.6: ऋषि व्यास ने बड़े धैर्य के साथ अपनी कामवासना को नियंत्रित करने का प्रयास किया; लेकिन वे अपने मन को रोक नहीं पाए, जो अप्सरा की ओर उन्मुख था।   |   mahabharat अध्याय 12.324: शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन एवं समावर्तन-संस्कारका वृत्तान्त   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.324.6 
स तु धैर्येण महता निगृह्णन् हृच्छयं मुनि:।
न शशाक नियन्तुं तद् व्यास: प्रविसृतं मन:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
ऋषि व्यास ने बड़े धैर्य के साथ अपनी कामवासना को नियंत्रित करने का प्रयास किया; लेकिन वे अपने मन को रोक नहीं पाए, जो अप्सरा की ओर उन्मुख था।
 
The sage Vyasa tried to control his sexual urge with great patience; but he was not able to stop his mind which was inclined towards the Apsara. 6.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)