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mahabharat 12.324.26: वे पूर्णतः एकाग्रचित्त होकर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए घोर तप करने लगे। अपने ज्ञान और तप के बल से महातपस्वी शुकदेव बाल्यकाल में ही देवताओं और ऋषियों के द्वारा पूज्य हो गए और उन्हें उपदेश देने में समर्थ हो गए॥26॥   |   mahabharat अध्याय 12.324: शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन एवं समावर्तन-संस्कारका वृत्तान्त   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 324: शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन एवं समावर्तन-संस्कारका वृत्तान्त  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.324.26 
उग्रं तप: समारेभे ब्रह्मचारी समाहित:।
देवतानामृषीणां च बाल्येऽपि स महातपा:।
सम्मन्त्रणीयो मान्यश्च ज्ञानेन तपसा तथा॥ २६॥
 
 
अनुवाद
वे पूर्णतः एकाग्रचित्त होकर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए घोर तप करने लगे। अपने ज्ञान और तप के बल से महातपस्वी शुकदेव बाल्यकाल में ही देवताओं और ऋषियों के द्वारा पूज्य हो गए और उन्हें उपदेश देने में समर्थ हो गए॥26॥
 
He became completely focused and started performing severe penance while observing celibacy. Through his knowledge and penance, the great ascetic Shukdev became respected by the gods and sages even in his childhood and was capable of giving them advice.॥26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)