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mahabharat 12.324.21-22h: तत्पश्चात् तेजस्वी अरणिसम्भुत शुक ने दिव्य जन्म प्राप्त करके ब्रह्मचर्य की दीक्षा ली और वहीं रहने लगे। वे अत्यन्त बुद्धिमान, व्रतशील और एकाग्रचित्त थे। 21 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.324: शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन एवं समावर्तन-संस्कारका वृत्तान्त   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 324: शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन एवं समावर्तन-संस्कारका वृत्तान्त  »  श्लोक 21-22h
 
 
श्लोक  12.324.21-22h 
आरणेयस्ततो दिव्यं प्राप्य जन्म महाद्युति:॥ २१॥
तत्रैवोवास मेधावी व्रतचारी समाहित:।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् तेजस्वी अरणिसम्भुत शुक ने दिव्य जन्म प्राप्त करके ब्रह्मचर्य की दीक्षा ली और वहीं रहने लगे। वे अत्यन्त बुद्धिमान, व्रतशील और एकाग्रचित्त थे। 21 1/2॥
 
Thereafter, the brilliant Aranisambhut Shuka, after attaining divine birth, took the initiation of celibacy and started living there. He was very intelligent, a fast follower and had a concentrated mind. 21 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)