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mahabharat 12.324.13-14h: कुरुनन्दन! राजेन्द्र! महात्मा शुकदेव के लिए आकाश से एक दण्ड और एक काले मृग का चर्म पृथ्वी पर गिरा। 13 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.324: शुकदेवजीकी उत्पत्ति और उनके यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन एवं समावर्तन-संस्कारका वृत्तान्त   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.324.13-14h 
अन्तरिक्षाच्च कौरव्य दण्ड: कृष्णाजिनं च ह॥ १३॥
पपात भूमिं राजेन्द्र शुकस्यार्थे महात्मन:।
 
 
अनुवाद
कुरुनन्दन! राजेन्द्र! महात्मा शुकदेव के लिए आकाश से एक दण्ड और एक काले मृग का चर्म पृथ्वी पर गिरा। 13 1/2॥
 
Kurunandan! Rajendra! A punishment and a black deer skin fell on the earth from the sky for Mahatma Shukdev. 13 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)