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श्लोक  12.323.9 
अश्वमेधसहस्रस्य वाजपेयशतस्य च।
योगस्य कलया तात न तुल्यं विद्यते फलम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
हे प्रिये! हजारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञों का फल भी योग की सोलहवीं अवस्था के फल के समान नहीं है।
 
O dear! The result of thousands of Ashwamedha and hundreds of Vajpeya sacrifices cannot even be compared with the result of the sixteenth stage of Yoga.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)