श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 323: व्यासजीकी पुत्रप्राप्तिके लिये तपस्या और भगवान् शंकरसे वरप्राप्ति  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.323.7 
तपोमूलमिदं सर्वं यन्मां पृच्छसि पाण्डव।
तदिन्द्रियाणि संयम्य तपो भवति नान्यथा॥ ७॥
 
 
अनुवाद
हे पाण्डुपुत्र! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, उसका मूल तप है। इन्द्रियों को वश में करने से ही तप की सिद्धि होती है, अन्यथा नहीं ॥7॥
 
O son of Pandu! The root of all that you are asking me about is austerity. Austerity is achieved only by controlling the senses, not otherwise. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)