श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 323: व्यासजीकी पुत्रप्राप्तिके लिये तपस्या और भगवान् शंकरसे वरप्राप्ति  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.323.10 
अत्र ते वर्तयिष्यामि जन्मयोगफलं तथा।
शुकस्याग्रॺं गतिं चैव दुर्विदामकृतात्मभि:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
राजन! मैं आपसे शुकदेवजी के जन्म की कथा, उनके योगफल और उनके उत्तम भाग्य के बारे में कह रहा हूँ, जिसे अजेय जीव भी नहीं समझ सकते॥10॥
 
King! I am telling you the story of Shukdev's birth, the results of his yoga, and his excellent fate, which even the unconquered souls cannot understand.॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)