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mahabharat 12.322.20: दूसरों को डाँटने-फटकारने और लोगों के विविध अपराधों की चर्चा करने से कोई लाभ नहीं है। मनुष्य को वही कार्य करना चाहिए जो स्वयं को सुंदर, उपयुक्त और हितकर लगे ॥20॥   |   mahabharat अध्याय 12.322: शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम कर्ताको अवश्य भोगना पड़ता है, इसका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 322: शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम कर्ताको अवश्य भोगना पड़ता है, इसका प्रतिपादन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.322.20 
अलमन्यैरुपालब्धै: कीर्तितैश्च व्यतिक्रमै:।
पेशलं चानुरूपं च कर्तव्यं हितमात्मन:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
दूसरों को डाँटने-फटकारने और लोगों के विविध अपराधों की चर्चा करने से कोई लाभ नहीं है। मनुष्य को वही कार्य करना चाहिए जो स्वयं को सुंदर, उपयुक्त और हितकर लगे ॥20॥
 
There is no use in reprimanding others and discussing people's various crimes. One should do only that work which seems beautiful, suitable and beneficial for oneself. ॥ 20॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि धर्ममूलिको नाम द्वाविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३२२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें धर्ममूलिकनामक तीन सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२२॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)