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mahabharat 12.321.90: मनुष्य अपने ही कर्मों के अनुसार इस जगत को छिन्न-भिन्न होते देखता है; इसलिए हे पुत्र! मैंने जो कुछ कहा है, उसे आचरण में लाओ॥90॥   |   mahabharat अध्याय 12.321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना  »  श्लोक 90
 
 
श्लोक  12.321.90 
पश्यति च्छिन्नभूतं हि जीवलोकं स्वकर्मणा।
तत् कुरुष्व तथा पुत्र कृत्स्नं यत् समुदाहृतम्॥ ९०॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य अपने ही कर्मों के अनुसार इस जगत को छिन्न-भिन्न होते देखता है; इसलिए हे पुत्र! मैंने जो कुछ कहा है, उसे आचरण में लाओ॥90॥
 
A man sees this world being torn apart according to his own deeds; therefore, son! Put into practice all that I have said.॥90॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)