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mahabharat 12.321.78: जो लोग यह जानते हैं कि शरीर के नष्ट हो जाने पर भी मनुष्य नहीं मरता और जो सज्जन पुरुषों के धर्म के मार्ग पर चलते हैं, उनका कभी नाश नहीं होता, वे ही बुद्धिमान हैं। जो इन सब बातों का विचार करके धर्म की वृद्धि करता रहता है, वही विद्वान है। जो धर्म से च्युत हो जाता है, वह मोहग्रस्त या मूर्ख है।   |   mahabharat अध्याय 12.321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  12.321.78 
न देहभेदे मरणं विजानतां
न च प्रणाश: स्वनुपालिते पथि।
धर्मं हि यो वर्धयते स पण्डितो
य एव धर्माच्च्यवते स मुह्यति॥ ७८॥
 
 
अनुवाद
जो लोग यह जानते हैं कि शरीर के नष्ट हो जाने पर भी मनुष्य नहीं मरता और जो सज्जन पुरुषों के धर्म के मार्ग पर चलते हैं, उनका कभी नाश नहीं होता, वे ही बुद्धिमान हैं। जो इन सब बातों का विचार करके धर्म की वृद्धि करता रहता है, वही विद्वान है। जो धर्म से च्युत हो जाता है, वह मोहग्रस्त या मूर्ख है।
 
Those who know that even after the destruction of the body, one does not die and those who follow the path of religion followed by noble men never perish, they are wise. He who keeps on increasing the religion by thinking about all these things is a learned person. He who falls from the religion is deluded or a fool.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)