श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  12.321.77 
अथेमं दर्शनोपायं सम्यग् यो वेत्ति मानव:।
सम्यक् स्वधर्मं कृत्वेह परत्र सुखमश्नुते॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य इस ईश्वरप्राप्ति के साधन को भलीभाँति जानता है, वह इस लोक में अपने धर्म का भलीभाँति पालन करके परलोक में सुख भोगता है ॥77॥
 
The person who knows well this means of realizing God, by properly following his dharma in this world, enjoys happiness in the next world. 77॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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