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श्लोक 12.321.77  |
अथेमं दर्शनोपायं सम्यग् यो वेत्ति मानव:।
सम्यक् स्वधर्मं कृत्वेह परत्र सुखमश्नुते॥ ७७॥ |
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| अनुवाद |
| जो मनुष्य इस ईश्वरप्राप्ति के साधन को भलीभाँति जानता है, वह इस लोक में अपने धर्म का भलीभाँति पालन करके परलोक में सुख भोगता है ॥77॥ |
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| The person who knows well this means of realizing God, by properly following his dharma in this world, enjoys happiness in the next world. 77॥ |
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