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श्लोक 12.321.71  |
निबन्धनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रति:।
छित्त्वैतां सुकृतो यान्ति नैनां छिन्दन्ति दुष्कृत:॥ ७१॥ |
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| अनुवाद |
| जब मनुष्य गाँव में रहकर वहाँ की वस्तुओं से प्रेम करने लगता है, तो वही रस्सी उसे बाँधती है। पुण्यात्मा लोग उसे काटकर उत्तम लोकों में चले जाते हैं, परन्तु पापी लोग उसे काट नहीं पाते ॥71॥ |
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| When a man lives in a village and starts loving the things there, that is the rope that binds him. Virtuous people cut it and go to the best worlds, but sinful people are not able to cut it. ॥ 71॥ |
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