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mahabharat 12.321.7: बेटा! यह शरीर जल के झाग के समान क्षणभंगुर है। आत्मा इसमें पक्षी की तरह निवास करती है और प्रियजनों का साथ भी स्थायी नहीं है। फिर भी तुम क्यों सोए पड़े हो?॥7॥   |   mahabharat अध्याय 12.321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.321.7 
फेनमात्रोपमे देहे जीवे शकुनिवत् स्थिते।
अनित्ये प्रियसंवासे कथं स्वपिषि पुत्रक॥ ७॥
 
 
अनुवाद
बेटा! यह शरीर जल के झाग के समान क्षणभंगुर है। आत्मा इसमें पक्षी की तरह निवास करती है और प्रियजनों का साथ भी स्थायी नहीं है। फिर भी तुम क्यों सोए पड़े हो?॥7॥
 
Son! This body is as temporary as the foam in water. The soul resides in it like a bird and the company of the loved ones is also not permanent. Still why are you lying asleep?॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)