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श्लोक 12.321.67  |
सकूलमूलबान्धवं प्रभुर्हरत्यसङ्गवान्।
न सन्ति यस्य वारका: कुरुष्व धर्मसंनिधिम्॥ ६७॥ |
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| अनुवाद |
| सर्वशक्तिमान काल किसी पर भी स्नेह नहीं करता। वह मूल और कुल सहित समस्त सम्बन्धियों को ले जाता है। उसे रोकने वाला कोई नहीं है; इसलिए तुम्हें धर्म का संचय करना चाहिए। 67. |
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| The all-powerful Kaal shows no affection towards anyone. He takes away all the relatives including the roots and the family. There is no one to stop him; therefore you should accumulate Dharma. 67. |
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