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mahabharat 12.321.66: शुद्ध भाव से धर्म या ज्ञान का भण्डार संचित करो, जो भयभीत होने पर अकेले यात्रा करने वाले पुण्यात्मा पुरुष के लिए परलोक में लाभदायक है ॥ 66॥   |   mahabharat अध्याय 12.321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  12.321.66 
यदेकपातिनां सतां भवत्यमुत्र गच्छताम्।
भयेषु साम्परायिकं निधत्स्व केवलं निधिम्॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
शुद्ध भाव से धर्म या ज्ञान का भण्डार संचित करो, जो भयभीत होने पर अकेले यात्रा करने वाले पुण्यात्मा पुरुष के लिए परलोक में लाभदायक है ॥ 66॥
 
Accumulate with pure intention the treasure of Dharma or knowledge which is beneficial in the next world to the virtuous person who travels alone when he is afraid. ॥ 66॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)