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mahabharat 12.321.64: देखो, तुम्हारी प्रमाद में स्थित काल तुम्हारे इन्द्रियों के समूह को अवाक (भोगशक्ति से वंचित) कर रहा है। इससे पहले कि वे अशक्त हो जाएँ, तुम उठकर शरीर सहित धर्म का पालन करने के लिए शीघ्रता करो ॥ 64॥   |   mahabharat अध्याय 12.321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  12.321.64 
पुरा करोति सोऽन्तक: प्रमादगोमुखां चमूम्।
यथागृहीतमुत्थितस्त्वरस्व धर्मपालने॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
देखो, तुम्हारी प्रमाद में स्थित काल तुम्हारे इन्द्रियों के समूह को अवाक (भोगशक्ति से वंचित) कर रहा है। इससे पहले कि वे अशक्त हो जाएँ, तुम उठकर शरीर सहित धर्म का पालन करने के लिए शीघ्रता करो ॥ 64॥
 
See, the time residing in your negligence is making your group of senses speechless (deprived of the power of enjoyment). Before they become incapable of doing so, you should stand up and hurry to follow the Dharma with your body. ॥ 64॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)