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mahabharat 12.321.58: वहाँ कर्मों के अनुसार जो फल मिलता है, वह किसी को नहीं मिलता, वहाँ अपने ही कर्मों का फल भोगना पड़ता है ॥58॥   |   mahabharat अध्याय 12.321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  12.321.58 
न तत्र संविभज्यते स्वकर्मणा परस्परम्।
तथा कृतं स्वकर्मजं तदेव भुज्यते फलम्॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
वहाँ कर्मों के अनुसार जो फल मिलता है, वह किसी को नहीं मिलता, वहाँ अपने ही कर्मों का फल भोगना पड़ता है ॥58॥
 
There the fruits that one gets according to one's deeds are not shared with anyone. There one has to suffer the consequences of one's own deeds. ॥ 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)