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श्लोक 12.321.58  |
न तत्र संविभज्यते स्वकर्मणा परस्परम्।
तथा कृतं स्वकर्मजं तदेव भुज्यते फलम्॥ ५८॥ |
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| अनुवाद |
| वहाँ कर्मों के अनुसार जो फल मिलता है, वह किसी को नहीं मिलता, वहाँ अपने ही कर्मों का फल भोगना पड़ता है ॥58॥ |
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| There the fruits that one gets according to one's deeds are not shared with anyone. There one has to suffer the consequences of one's own deeds. ॥ 58॥ |
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