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mahabharat 12.321.52: मनुष्य जो सुवर्ण और रत्नों के ढेर लगाता है, वे सब उसके शरीर के नष्ट हो जाने पर उसके किसी काम के नहीं रहते (क्योंकि वे सब यहीं रह जाते हैं)॥52॥   |   mahabharat अध्याय 12.321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  12.321.52 
हिरण्यरत्नसंचया: शुभाशुभेन संचिता:।
न तस्य देहसंक्षये भवन्ति कार्यसाधका:॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य जो सुवर्ण और रत्नों के ढेर लगाता है, वे सब उसके शरीर के नष्ट हो जाने पर उसके किसी काम के नहीं रहते (क्योंकि वे सब यहीं रह जाते हैं)॥52॥
 
The heaps of gold and precious stones which a man accumulates by doing all kinds of good and bad deeds are of no use to him after his body is destroyed (because they all remain here).॥ 52॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)