Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.321.28: जो राजा सदैव धर्मपरायण रहता है और अपनी प्रजा का, चाहे वह अच्छी हो या बुरी, उचित ध्यान से पालन करता है, वह पुण्यात्माओं के लोक को प्राप्त होता है। यदि वह स्वयं भी अनेक प्रकार के शुभ कर्म करता है, तो उसके फलस्वरूप उसे अप्राप्त और निष्कलंक सुख प्राप्त होता है॥28॥   |   mahabharat अध्याय 12.321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.321.28 
राजा सदा धर्मपर: शुभाशुभस्य गोप्ता
समीक्ष्य सुकृतिनां दधाति लोकान्।
बहुविधमपि चरति प्रविशति
सुखमनुपगतं निरवद्यम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
जो राजा सदैव धर्मपरायण रहता है और अपनी प्रजा का, चाहे वह अच्छी हो या बुरी, उचित ध्यान से पालन करता है, वह पुण्यात्माओं के लोक को प्राप्त होता है। यदि वह स्वयं भी अनेक प्रकार के शुभ कर्म करता है, तो उसके फलस्वरूप उसे अप्राप्त और निष्कलंक सुख प्राप्त होता है॥28॥
 
A king who always remains religious and takes care of his subjects, both good and bad, with due consideration, attains the world of virtuous souls. If he himself also performs various kinds of auspicious deeds, then as a result of them he gets unattained and blameless happiness.॥28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)