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mahabharat 12.321.24: दीर्घकाल तक घोर तप करने से ब्राह्मण का शरीर प्राप्त होता है। इसे प्राप्त करके विषय-वासनाओं में फँसकर इसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। अतः यदि अपना कल्याण चाहते हो, तो कुशल कर्म में लग जाओ और स्वाध्याय, तप और इन्द्रिय-संयम में सदैव तत्पर रहने का प्रयत्न करो। 24॥   |   mahabharat अध्याय 12.321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  12.321.24 
ब्राह्मण्यं बहुभिरवाप्यते तपोभि-
स्तल्लब्ध्वा न रतिपरेण हेलितव्यम्।
स्वाध्याये तपसि दमे च नित्ययुक्त:
क्षेमार्थी कुशलपर: सदा यतस्व॥ २४॥
 
 
अनुवाद
दीर्घकाल तक घोर तप करने से ब्राह्मण का शरीर प्राप्त होता है। इसे प्राप्त करके विषय-वासनाओं में फँसकर इसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। अतः यदि अपना कल्याण चाहते हो, तो कुशल कर्म में लग जाओ और स्वाध्याय, तप और इन्द्रिय-संयम में सदैव तत्पर रहने का प्रयत्न करो। 24॥
 
By doing great penance for a long time one gets the body of a Brahmin. After attaining it, one should not waste it by getting trapped in sensual desires. Therefore, if you want your welfare, then engage in efficient work and always try to remain fully engaged in self-study, penance and control of senses. 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)