श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 321: व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.321.1 
युधिष्ठिर उवाच
कथं निर्वेदमापन्न: शुको वैयासकि: पुरा।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा- पितामह! व्यासपुत्र शुकदेव ने पूर्वकाल में किस प्रकार संन्यास प्राप्त किया था? मैं यह सुनना चाहता हूँ। इस विषय में मेरी बड़ी जिज्ञासा है॥1॥
 
Yudhishthira asked- Grandfather! How did Vyasa's son Shukdev attain renunciation in the past? I want to hear this. I am very curious about this subject.॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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