श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 98-99h
 
 
श्लोक  12.320.98-99h 
शब्द: स्पर्शो रसो रूपं गन्ध: पञ्चेन्द्रियाणि च।
पृथगात्मान आत्मानं संश्लिष्टा जतुकाष्ठवत्॥ ९८॥
न चैषां चोदना काचिदस्तीत्येष विनिश्चय:।
 
 
अनुवाद
शब्द, स्पर्श, रूप, रस, घ्राण और पाँचों इन्द्रियाँ - आत्मा से पृथक् होने पर भी, लकड़ी में लगे लाख की भाँति आत्मा से जुड़े हुए हैं; परन्तु उनमें कोई स्वतंत्र प्रेरणा शक्ति नहीं है। ऐसा विद्वानों का निष्कर्ष है ॥98 1/2॥
 
Sound, touch, sight, taste and smell, and the five senses - even though separate from the soul, they are connected to the soul like lacquer stuck to wood; but they do not have any independent inspiration power. This is the conclusion of the learned. ॥98 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)