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mahabharat 12.320.95: अतः राजन! तुम स्थिर मन और एकाग्रता से इन अर्थपूर्ण वचनों को सुनो ॥95॥   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  12.320.95 
तदर्थवदिदं वाक्यमुपेतं वाक्यसम्पदा।
अविक्षिप्तमना राजन्नेकाग्र: श्रोतुमर्हसि॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
अतः राजन! तुम स्थिर मन और एकाग्रता से इन अर्थपूर्ण वचनों को सुनो ॥95॥
 
So Rajan! You listen to these meaningful words with a steady mind and concentration. 95॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)