श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  12.320.93 
अथ य: स्वार्थमुत्सृज्य परार्थं प्राह मानव:।
विशङ्का जायते तस्मिन् वाक्यं तदपि दोषवत्॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
और जब कोई मनुष्य अपना स्वार्थ त्यागकर दूसरे के लिए कुछ कहता है, उस समय सुननेवाले के हृदय में उसके विषय में संदेह उत्पन्न हो जाता है; अतः वह कथन भी दोषयुक्त है ॥93॥
 
And when a person abandons his selfishness and says something for someone else, at that time a doubt arises in the heart of the listener about him; hence that statement is also flawed. ॥ 93॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)