श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  12.320.89 
न न्यूनं कष्टशब्दं वा विक्रमाभिहितं न च।
न शेषमनु कल्पेन निष्कारणमहेतुकम्॥ ८९॥
 
 
अनुवाद
मेरे उस वाक्य में लघु शब्द नामक कोई दोष नहीं होगा, कोई बोझिल शब्द प्रयुक्त नहीं होगा, उसका उच्चारण क्रम से नहीं होगा। उसमें अन्य शब्दों के अध्याहार और गुण-दोष की आवश्यकता नहीं होगी। यह वाक्य उद्देश्यहीन और तर्क-शून्य भी नहीं होगा। 89.
 
In that sentence of mine, there will be no defect called diminutive words, no cumbersome words will be used, it will not be pronounced out of order. There will be no need for the adhyāhār and attribution of other words in it. This sentence will not be purposeless and devoid of logic either. 89.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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