श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  12.320.88 
न गुर्वक्षरसंयुक्तं पराङ्मुखसुखं न च।
नानृतं न त्रिवर्गेण विरुद्धं नाप्यसंस्कृतम्॥ ८८॥
 
 
अनुवाद
मेरे इस कथन में गुरु और क्रूर वचनों का मेल नहीं होगा; इसमें कोमल और कोमल वचन होंगे। यह निराशावादी लोगों को प्रिय नहीं होगा। यह न तो मिथ्या होगा, न धर्म, अर्थ और काम के विरुद्ध होगा और न ही संस्कारों से रहित होगा। 88।
 
In this statement of mine, there will be no combination of Guru and cruel words; it will have soft and delicate words. It will not be pleasant for the people who are pessimistic. It will neither be a lie nor against Dharma, Artha and Kama and will be devoid of sanskars. 88.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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