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mahabharat 12.320.87: मैं ऐसा वाक्य बोलूँगा जो अर्थपूर्ण होगा। उसके अर्थ में कोई अंतर नहीं होगा। वह न्यायसंगत होगा। उसमें अनावश्यक, कठोर और संदेह पैदा करने वाले शब्द नहीं होंगे। इस प्रकार, मैं सर्वोत्तम वाक्य बोलूँगा।   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  12.320.87 
उपेतार्थमभिन्नार्थं न्यायवृत्तं न चाधिकम्।
नाश्लक्ष्णं न च संदिग्धं वक्ष्यामि परमं तत:॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
मैं ऐसा वाक्य बोलूँगा जो अर्थपूर्ण होगा। उसके अर्थ में कोई अंतर नहीं होगा। वह न्यायसंगत होगा। उसमें अनावश्यक, कठोर और संदेह पैदा करने वाले शब्द नहीं होंगे। इस प्रकार, मैं सर्वोत्तम वाक्य बोलूँगा।
 
I will speak such a sentence which will be meaningful. There will be no difference in its meaning. It will be just. It will not contain unnecessary, harsh and doubt-inducing words. In this way, I will speak the best sentence.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)