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mahabharat 12.320.85: हे मनुष्यों के स्वामी! जब इच्छा या द्वेष से उत्पन्न होने वाले दुःखों के कारण एक प्रकार का दुःख प्रबल होता है, तब जो प्रवृत्ति उत्पन्न होती है, उसे प्रयोजन कहते हैं ॥ 85॥   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  12.320.85 
इच्छाद्वेषभवैर्दु:खै: प्रकर्षो यत्र जायते।
तत्र या नृपते वृत्तिस्तत् प्रयोजनमिष्यते॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! जब इच्छा या द्वेष से उत्पन्न होने वाले दुःखों के कारण एक प्रकार का दुःख प्रबल होता है, तब जो प्रवृत्ति उत्पन्न होती है, उसे प्रयोजन कहते हैं ॥ 85॥
 
O Lord of men! When one kind of suffering is predominant due to the sufferings caused by desire or hatred, the tendency that arises there is called purpose. ॥ 85॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)