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mahabharat 12.320.68: तुम अपनी असहिष्णुता से उत्पन्न योगसिद्धि के मोह से मोहित हो गए हो और योग को काम के साथ जोड़ रहे हो, जैसे विष और अमृत को मिलाते हो ॥68॥   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  12.320.68 
सा स्वेनामर्षजेन त्वमृद्धिमोहेन मोहिता।
भूय: सृजसि योगांस्त्वं विषामृतमिवैकताम्॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
तुम अपनी असहिष्णुता से उत्पन्न योगसिद्धि के मोह से मोहित हो गए हो और योग को काम के साथ जोड़ रहे हो, जैसे विष और अमृत को मिलाते हो ॥68॥
 
You are deluded by the delusion of yogic prosperity which is born out of your intolerance and you are associating yoga with sex, like mixing poison and nectar. ॥ 68॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)