Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.320.65: तूने स्वयं ही अपना छिपा हुआ दोष प्रकट कर दिया है। इससे तू दुष्ट प्रतीत होता है। तेरी दुष्टता का यह चौथा चिन्ह स्पष्ट दिखाई देता है, जो हृदय के प्रेम को ठेस पहुँचाने वाला है। 65। | mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
इदमन्यच्चतुर्थं ते भावस्पर्शविघातकम्।
दुष्टाया लक्ष्यते लिङ्गं विवृण्वत्याप्रकाशितम्॥ ६५॥
अनुवाद
तूने स्वयं ही अपना छिपा हुआ दोष प्रकट कर दिया है। इससे तू दुष्ट प्रतीत होता है। तेरी दुष्टता का यह चौथा चिन्ह स्पष्ट दिखाई देता है, जो हृदय के प्रेम को ठेस पहुँचाने वाला है। 65।
You yourself have revealed your fault which was hidden. This makes you look like a wicked person. This fourth sign of your wickedness is clearly visible, which is going to hurt the love of the heart. 65.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥