|
| |
| |
श्लोक 12.320.63  |
सा त्वमेतान्यकार्याणि कार्यापेक्षा व्यवस्यसि।
अविज्ञानेन वा युक्ता मिथ्याज्ञानेन वा पुन:॥ ६३॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| इस कार्य की सिद्धि के साधन की आशा से ही तुम अज्ञान या मिथ्या ज्ञान के कारण ये सब अवांछनीय कार्य करने में तत्पर हो गए हो ॥ 63॥ |
| |
| With the expectation of the means to accomplish this task, owing to ignorance or false knowledge you have become ready to perform all these undesirable tasks. ॥ 63॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|