श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  12.320.63 
सा त्वमेतान्यकार्याणि कार्यापेक्षा व्यवस्यसि।
अविज्ञानेन वा युक्ता मिथ्याज्ञानेन वा पुन:॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
इस कार्य की सिद्धि के साधन की आशा से ही तुम अज्ञान या मिथ्या ज्ञान के कारण ये सब अवांछनीय कार्य करने में तत्पर हो गए हो ॥ 63॥
 
With the expectation of the means to accomplish this task, owing to ignorance or false knowledge you have become ready to perform all these undesirable tasks. ॥ 63॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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