Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.320.53: संन्यासिनी! इस प्रकार मैं जीवन्मुक्त हो गया हूँ। यद्यपि तुममें योग का प्रभाव देखकर मेरे मन में तुम्हारे प्रति श्रद्धा और आदर उत्पन्न हो गया है, तथापि मैं तुम्हारे रूप और सौन्दर्य को योग साधना के योग्य नहीं मानता। अतः इस विषय में मैं जो कहता हूँ, उसे तुम कृपापूर्वक सुनो। ॥53॥ | mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
सोऽहमेवंगतो मुक्तो जातास्थस्त्वयि भिक्षुकि।
अयथार्थं हि ते वर्णं वक्ष्यामि शृणु तन्मम॥ ५३॥
अनुवाद
संन्यासिनी! इस प्रकार मैं जीवन्मुक्त हो गया हूँ। यद्यपि तुममें योग का प्रभाव देखकर मेरे मन में तुम्हारे प्रति श्रद्धा और आदर उत्पन्न हो गया है, तथापि मैं तुम्हारे रूप और सौन्दर्य को योग साधना के योग्य नहीं मानता। अतः इस विषय में मैं जो कहता हूँ, उसे तुम कृपापूर्वक सुनो। ॥53॥
Sanyasini! Thus I am liberated in life. Although I have developed faith and respect for you after seeing the effect of yoga in you, yet I do not consider your form and beauty suitable for yoga sadhana. Therefore, please listen to what I say in this regard. ॥ 53॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥