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mahabharat 12.320.45: किसी पर वश में रखना और किसी पर कृपा करना, इसे प्रभुता कहते हैं। जैसा राजा में होता है, वैसा ही संन्यासी में भी होता है। इस दृष्टि से जब संन्यासी भी राजा के समान हैं, तो फिर यह मानने का क्या कारण है कि केवल वे ही मुक्त हैं?॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  12.320.45 
आधिपत्ये तथा तुल्ये निग्रहानुग्रहात्मके।
राजभिर्भिक्षुकास्तुल्या मुच्यन्ते केन हेतुना॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
किसी पर वश में रखना और किसी पर कृपा करना, इसे प्रभुता कहते हैं। जैसा राजा में होता है, वैसा ही संन्यासी में भी होता है। इस दृष्टि से जब संन्यासी भी राजा के समान हैं, तो फिर यह मानने का क्या कारण है कि केवल वे ही मुक्त हैं?॥ 45॥
 
Controlling someone and showing favour to someone is called dominion. As it is in a king, so it is in a sanyasi (monk). From this point of view, when sanyasis are also like kings, then what is the reason to believe that only they are liberated?॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)