श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  12.320.44 
दोषदर्शी तु गार्हस्थ्ये यो व्रजत्याश्रमान्तरे।
उत्सृजन् परिगृह्णंश्च सोऽपि सङ्गान्न मुच्यते॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
जो गृहस्थ जीवन में दोष देखकर उसे त्यागकर दूसरे जीवन में चला जाता है, वह भी कुछ त्यागता है और कुछ ग्रहण करता है; इसलिए वह भी संगति के दोषों से मुक्त नहीं होता ॥ 44॥
 
He who, seeing faults in the household life, abandons it and goes to another life, he too gives up something and accepts something; hence, he too does not get rid of the faults of association. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)