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mahabharat 12.320.37: मैं कामनाओं से मुक्त हूँ और सदैव प्रसन्न रहता हूँ। मेरी दृष्टि में मिट्टी, पत्थर और सोना, सब एक समान हैं। मैं आसक्ति से मुक्त हूँ और राजा के सिंहासन पर आसीन हूँ। इसलिए अन्य त्रिदंडी साधुओं में मेरा स्थान विशेष है। 37.   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  12.320.37 
सुखी सोऽहमवाप्तार्थ: समलोष्टाश्मकाञ्चन:।
मुक्तसङ्ग: स्थितो राज्ये विशिष्टोऽन्यैस्त्रिदण्डिभि:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
मैं कामनाओं से मुक्त हूँ और सदैव प्रसन्न रहता हूँ। मेरी दृष्टि में मिट्टी, पत्थर और सोना, सब एक समान हैं। मैं आसक्ति से मुक्त हूँ और राजा के सिंहासन पर आसीन हूँ। इसलिए अन्य त्रिदंडी साधुओं में मेरा स्थान विशेष है। 37.
 
I am free from desires and always feel happy. In my eyes, lumps of earth, stones and gold are all the same. I am free from attachment and am established on the throne of a king. Hence, my position is special among other Tridandi sadhus. 37.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)