श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.320.35 
नाभिरज्यति कस्मिंश्चिन्नानर्थे न परिग्रहे।
नाभिरज्यति चैतेषु व्यर्थत्वाद् रागरोषयो:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
मेरी बुद्धि किसी पाप या भोग-संग्रह में प्रवृत्त नहीं होती। स्त्री आदि का मोह और शत्रु आदि का क्रोध व्यर्थ है, इसलिए मेरी बुद्धि उनमें प्रवृत्त नहीं होती ॥35॥
 
My intellect is not involved in any evil or in the accumulation of pleasures. The affection for women etc. and the anger for enemies etc. are futile and hence my intellect is not inclined towards them. ॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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