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mahabharat 12.320.33-34: जैसे मिट्टी के बर्तन या अन्य किसी बर्तन में भुना हुआ बीज, अंकुर उगाने योग्य खेत में बोने पर भी अंकुरित नहीं होता, क्योंकि वह बीज नहीं रह जाता, उसी प्रकार मेरे तपस्वी गुरु भगवान पंचसिख द्वारा मुझे दिया गया ज्ञान बीजरहित है, अतः वह सांसारिक भोगों के क्षेत्र में अंकुरित नहीं होता॥ 33-34॥   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  12.320.33-34 
यथा चोत्तापितं बीजं कपाले यत्र तत्र वा।
प्राप्याप्यङ्कुरहेतुत्वमबीजत्वान्न जायते॥ ३३॥
तद्वद् भगवतानेन शिखा प्रोक्तेन भिक्षुणा।
ज्ञानं कृतमबीजं मे विषयेषु न जायते॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जैसे मिट्टी के बर्तन या अन्य किसी बर्तन में भुना हुआ बीज, अंकुर उगाने योग्य खेत में बोने पर भी अंकुरित नहीं होता, क्योंकि वह बीज नहीं रह जाता, उसी प्रकार मेरे तपस्वी गुरु भगवान पंचसिख द्वारा मुझे दिया गया ज्ञान बीजरहित है, अतः वह सांसारिक भोगों के क्षेत्र में अंकुरित नहीं होता॥ 33-34॥
 
Just as a seed roasted in an earthen pot or any other vessel does not germinate even after being sown in a field suitable for growing sprouts because it is no longer a seed, similarly the knowledge imparted to me by my ascetic Guru Bhagwan Panchsikh is seedless. Hence it does not germinate in the field of worldly pleasures.॥ 33-34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)