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mahabharat 12.320.188: जनेश्वर! मैं अपनी प्रतिज्ञा से कभी विचलित नहीं होता। मैं बिना सोचे-समझे कभी कुछ नहीं बोलता और बहुत सोच-विचार कर ही मैं आपके पास आया हूँ।   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 188
 
 
श्लोक  12.320.188 
नास्थिरा स्वप्रतिज्ञायां नासमीक्ष्य प्रवादिनी।
नासमीक्ष्यागता चेह त्वत्सकाशं जनाधिप॥ १८८॥
 
 
अनुवाद
जनेश्वर! मैं अपनी प्रतिज्ञा से कभी विचलित नहीं होता। मैं बिना सोचे-समझे कभी कुछ नहीं बोलता और बहुत सोच-विचार कर ही मैं आपके पास आया हूँ।
 
Janeshwar! I never deviate from my vows. I never speak anything without thinking and I have come to you after giving it a lot of thought. 188.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)