श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 187
 
 
श्लोक  12.320.187 
नास्मि सत्रप्रतिच्छन्ना न परस्वापहारिणी।
न धर्मसंकरकरी स्वधर्मेऽस्मि धृतव्रता॥ १८७॥
 
 
अनुवाद
मैंने संन्यासिनी का वेश नहीं धारण किया है। मैं दूसरों का धन नहीं चुराती, न ही धर्मभ्रम फैलाती हूँ। मैं ब्रह्मचर्य व्रत का दृढ़तापूर्वक पालन करती हूँ और अपने धर्म में दृढ़ रहती हूँ।॥187॥
 
I have not assumed the disguise of a female sanyasini. I do not steal other's wealth, nor do I spread religious confusion. I firmly observe the vow of celibacy and remain steadfast in my religion.॥ 187॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)