श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 178
 
 
श्लोक  12.320.178 
न हि मुक्तस्य मुक्तेन ज्ञस्यैकत्वपृथक्त्वयो:।
भावाभावसमायोगे जायते वर्णसंकर:॥ १७८॥
 
 
अनुवाद
जीवन्मुक्त ज्ञानी के साथ जीवन्मुक्त ज्ञानी का संयोग, पृथक्त्व के साथ एकत्व और अभाव (प्रकृति) के साथ भावना (आत्मा) का संयोग होने पर वर्णसंकरता उत्पन्न नहीं हो सकती ॥178॥
 
Varna hybridity cannot arise if there is a combination of Jivanmukt Gnani with Jivanmukt Jnani, unity with separateness and feeling (soul) with absence (nature). 178॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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