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श्लोक 12.320.178  |
न हि मुक्तस्य मुक्तेन ज्ञस्यैकत्वपृथक्त्वयो:।
भावाभावसमायोगे जायते वर्णसंकर:॥ १७८॥ |
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| अनुवाद |
| जीवन्मुक्त ज्ञानी के साथ जीवन्मुक्त ज्ञानी का संयोग, पृथक्त्व के साथ एकत्व और अभाव (प्रकृति) के साथ भावना (आत्मा) का संयोग होने पर वर्णसंकरता उत्पन्न नहीं हो सकती ॥178॥ |
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| Varna hybridity cannot arise if there is a combination of Jivanmukt Gnani with Jivanmukt Jnani, unity with separateness and feeling (soul) with absence (nature). 178॥ |
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