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mahabharat 12.320.175: हे मिथिला नरेश! जिस प्रकार कमल के पत्ते पर पड़ा जल उसे स्पर्श नहीं करता, उसी प्रकार मैं भी आपको स्पर्श किए बिना ही आपके भीतर निवास करूँगा। 175.   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 175
 
 
श्लोक  12.320.175 
यथा पुष्करपर्णस्थं जलं तत्पर्णमस्पृशत्।
तिष्ठत्यस्पृशती तद्वत् त्वयि वत्स्यामि मैथिल॥ १७५॥
 
 
अनुवाद
हे मिथिला नरेश! जिस प्रकार कमल के पत्ते पर पड़ा जल उसे स्पर्श नहीं करता, उसी प्रकार मैं भी आपको स्पर्श किए बिना ही आपके भीतर निवास करूँगा। 175.
 
King of Mithila! Just as the water falling on a lotus leaf does not touch it, in the same way I will reside within you without touching you. 175.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)