Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.320.164: मुझे अपने शरीर में आसक्ति नहीं है, फिर दूसरे के शरीर में कैसे आसक्ति हो सकती है ? मुझ योग में तत्पर रहने वाली संन्यासिनी के विषय में आपको ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए ॥164॥ | mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
स्वदेहेनाभिषङ्गो मे कुत: परपरिग्रहे।
न मामेवंविधां युक्तामीदृशं वक्तुमर्हसि॥ १६४॥
अनुवाद
मुझे अपने शरीर में आसक्ति नहीं है, फिर दूसरे के शरीर में कैसे आसक्ति हो सकती है ? मुझ योग में तत्पर रहने वाली संन्यासिनी के विषय में आपको ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए ॥164॥
I don't have any attachment to my own body, then how can I have any attachment to someone else's body? You should not say such things about me, a Sanyasini, who is thus engaged in Yoga. 164॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥