श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 164
 
 
श्लोक  12.320.164 
स्वदेहेनाभिषङ्गो मे कुत: परपरिग्रहे।
न मामेवंविधां युक्तामीदृशं वक्तुमर्हसि॥ १६४॥
 
 
अनुवाद
मुझे अपने शरीर में आसक्ति नहीं है, फिर दूसरे के शरीर में कैसे आसक्ति हो सकती है ? मुझ योग में तत्पर रहने वाली संन्यासिनी के विषय में आपको ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए ॥164॥
 
I don't have any attachment to my own body, then how can I have any attachment to someone else's body? You should not say such things about me, a Sanyasini, who is thus engaged in Yoga. 164॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)