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mahabharat 12.320.160: जो राजा अति उत्साही और क्षत्रिय धर्म में रत है, वह अपनी प्रजा की आय का दसवाँ भाग कर के रूप में लेकर संतुष्ट रहता है, जबकि साधारण शासक दसवाँ भाग से भी कम लेकर संतुष्ट रहते हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 160
 
 
श्लोक  12.320.160 
यश्च राजा महोत्साह: क्षत्रधर्मे रतो भवेत्।
स तुष्येद् दशभागेन ततस्त्वन्यो दशावरै:॥ १६०॥
 
 
अनुवाद
जो राजा अति उत्साही और क्षत्रिय धर्म में रत है, वह अपनी प्रजा की आय का दसवाँ भाग कर के रूप में लेकर संतुष्ट रहता है, जबकि साधारण शासक दसवाँ भाग से भी कम लेकर संतुष्ट रहते हैं।
 
A king who is very enthusiastic and devoted to Kshatriya-dharma is satisfied by taking one-tenth of the income of his subjects as tax whereas ordinary rulers are satisfied by taking less than one-tenth. 160.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)