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mahabharat 12.320.155-156h: हे राजन! आप इस नगर, राष्ट्र, सेना, कोष और मंत्रियों को अपना ही मानते हैं और कहते हैं कि 'ये सब मेरे हैं', परन्तु यह आपका भ्रम है। मैं पूछता हूँ, ये किसके हैं और किसके नहीं?   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 155-156h
 
 
श्लोक  12.320.155-156h 
ममेदमिति यच्चेदं पुरं राष्ट्रं च मन्यसे॥ १५५॥
बलं कोशममात्यांश्च कस्यैतानि न वा नृप।
 
 
अनुवाद
हे राजन! आप इस नगर, राष्ट्र, सेना, कोष और मंत्रियों को अपना ही मानते हैं और कहते हैं कि 'ये सब मेरे हैं', परन्तु यह आपका भ्रम है। मैं पूछता हूँ, ये किसके हैं और किसके नहीं?
 
O Lord of kings! You consider this city, the nation, the army, the treasury and the ministers as your own saying that 'all these are mine', but that is your delusion. I ask, whose are these and whose are these not?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)