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mahabharat 12.320.154-155h: ऐसा राज्य कौन स्वीकार करेगा जिसमें सुख बहुत कम और दुःख बहुत अधिक हो, जो सर्वथा अर्थहीन हो, जो घास में लगी आग के समान क्षणिक और झाग के बुलबुले के समान क्षणभंगुर हो? और उसे स्वीकार करने पर शांति किसे मिलेगी?   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 154-155h
 
 
श्लोक  12.320.154-155h 
तदल्पसुखमत्यर्थं बहुदु:खमसारवत्।
तृणाग्निज्वलनप्रख्यं फेनबुद्‍बुदसंनिभम्॥ १५४॥
को राज्यमभिपद्येत प्राप्य चोपशमं लभेत्।
 
 
अनुवाद
ऐसा राज्य कौन स्वीकार करेगा जिसमें सुख बहुत कम और दुःख बहुत अधिक हो, जो सर्वथा अर्थहीन हो, जो घास में लगी आग के समान क्षणिक और झाग के बुलबुले के समान क्षणभंगुर हो? और उसे स्वीकार करने पर शांति किसे मिलेगी?
 
Who will accept such a kingdom in which there is very little happiness but a lot of sorrow, which is completely meaningless, which is as short-lived as a fire in grass and as fleeting as a bubble of foam? And who can find peace after accepting it?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)