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mahabharat 12.320.145: राजा के पास भिखारी सदैव आते रहते हैं और धन की याचना करते हैं; परन्तु राजा भिक्षा के सबसे अधिक पात्र को भी कुछ देने का साहस नहीं करता। वह अपने धन को पूर्णतः सुरक्षित रखना चाहता है ॥145॥   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  12.320.145 
अभिगम्याभिगम्यैवं याचन्ते सततं नरा:।
न चाप्युत्सहते दातुं वित्तरक्षी महाजनान्॥ १४५॥
 
 
अनुवाद
राजा के पास भिखारी सदैव आते रहते हैं और धन की याचना करते हैं; परन्तु राजा भिक्षा के सबसे अधिक पात्र को भी कुछ देने का साहस नहीं करता। वह अपने धन को पूर्णतः सुरक्षित रखना चाहता है ॥145॥
 
Beggars always come to the king and beg for money; but the king does not dare to give anything even to those who are most deserving of alms. He wants to keep his wealth completely safe. ॥ 145॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)