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mahabharat 12.320.142: जब राजा दूसरों को कोई कार्य करने की आज्ञा देता है, तो कहा जाता है कि उसे स्वतंत्रता है; किन्तु ऐसे अवसरों पर भी, विभिन्न समयों पर, सिंहासन पर बैठे राजा को उसके मंत्रियों द्वारा उसकी इच्छा के विपरीत कार्य करने के लिए विवश किया जाता है।   |   mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना  »  श्लोक 142
 
 
श्लोक  12.320.142 
यदा ह्याज्ञापयत्यन्यांस्तत्रास्योक्ता स्वतन्त्रता।
अवश: कार्य ते तत्र तस्मिंस्तस्मिन् क्षणे स्थित:॥ १४२॥
 
 
अनुवाद
जब राजा दूसरों को कोई कार्य करने की आज्ञा देता है, तो कहा जाता है कि उसे स्वतंत्रता है; किन्तु ऐसे अवसरों पर भी, विभिन्न समयों पर, सिंहासन पर बैठे राजा को उसके मंत्रियों द्वारा उसकी इच्छा के विपरीत कार्य करने के लिए विवश किया जाता है।
 
When the king commands others to do something, it is said that he has freedom; but even on such occasions, at different times, the king seated on the throne is forced by his ministers to do things contrary to his wishes. 142.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)