Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.320.139-140: इसी प्रकार राजा भोग, भोजन, वस्त्राभूषण आदि सीमित पदार्थों के विषय में, दुष्टों का दमन करने तथा सज्जनों पर कृपा करने के विषय में भी सदैव पराधीन रहता है। इसी प्रकार वह बहुत थोड़े से कार्यों में भी स्वतंत्र नहीं रहता, फिर भी उनमें आसक्त रहता है। संधि और युद्ध करने में भी राजा को स्वतंत्रता कहाँ है?॥139-140॥ | mahabharat अध्याय 12.320: राजा जनककी परीक्षा करनेके लिये आयी हुई सुलभाका उनके शरीरमें प्रवेश करना, राजा जनकका उसपर दोषारोपण करना एवं सुलभाका युक्तियोंद्वारा निराकरण करते हुए राजा जनकको अज्ञानी बताना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
एवमेवोपभोगेषु भोजनाच्छादनेषु च।
गुणेषु परिमेयेषु निग्रहानुग्रहं प्रति॥ १३९॥
परतन्त्र: सदा राजा स्वल्पेष्वपि प्रसज्जते।
संधिविग्रहयोगे च कुतो राज्ञ: स्वतन्त्रता॥ १४०॥
अनुवाद
इसी प्रकार राजा भोग, भोजन, वस्त्राभूषण आदि सीमित पदार्थों के विषय में, दुष्टों का दमन करने तथा सज्जनों पर कृपा करने के विषय में भी सदैव पराधीन रहता है। इसी प्रकार वह बहुत थोड़े से कार्यों में भी स्वतंत्र नहीं रहता, फिर भी उनमें आसक्त रहता है। संधि और युद्ध करने में भी राजा को स्वतंत्रता कहाँ है?॥139-140॥
Similarly, the king is always dependent in matters of enjoyment, food, covering and other limited objects, and in matters of suppressing the wicked and showing favour to the noble. Similarly, he is not independent even in very few tasks, but still he remains attached to them. Where does the king have freedom even in entering into treaties and wars?॥139-140॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥